अहं: एक पवित्र साधन अहंकार को समझने और उसके साथ अधिक सजग संबंध बनाने की एक करुणामय यात्रा है। क्या अहं को मिटाना आवश्यक है, या उसे इतना स्वस्थ बनाया जा सकता है कि वह विवेक, सेवा और आत्मबोध का साधन बने? विमला राव इस प्रश्न को वेदान्त की दृष्टि और जीवन के अनुभवों से खोलती हैं। यह पुस्तक बताती है कि व्यक्तिगत पहचान अपने आप में शत्रु नहीं है। नाम, भूमिकाएँ और जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए उसकी आवश्यकता होती है। किन्तु जब यही पहचान भय, तुलना, नियंत्रण, प्रशंसा की चाह या पुराने घावों से संचालित होने लगती है, तो अस्वस्थ अहं दुःख और संबंधों में दूरी पैदा कर सकता है। जागरूकता, विनम्रता और विवेक के साथ वही पहचान स्वस्थ अहं के रूप में जीवन की सेवा कर सकती है। पुस्तक में मन, बुद्धि, चित्त और अहं के कार्य; प्रकृति के तीन गुण; पंचकोश; साक्षी आत्मा; कर्म और समर्पण जैसे विषय स्पष्ट भाषा में समझाए गए हैं। उदाहरण और आत्मचिंतन के प्रश्न पाठक को अपनी प्रतिक्रियाएँ पहचानने, आत्मसम्मान तथा स्वस्थ सीमाएँ विकसित करने और निर्णयों में बुद्धि की भूमिका समझने में सहायता करते हैं। रुककर देखना, ध्यान से सुनना, कृतज्ञता, क्षमा, जप, प्रार्थना, ध्यान और निःस्वार्थ सेवा जैसे अभ्यास इस समझ को व्यवहार में उतारने का मार्ग देते हैं। अस्वस्थ अहं से स्वस्थ अहं की ओर बढ़ना स्वयं को नकारना नहीं, बल्कि अपनी मानवीय पहचान को उसके उचित स्थान पर रखना है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो आत्मचिंतन, वेदान्त और आध्यात्मिक जीवन में रुचि रखते हैं और स्पष्टता तथा समर्पण के साथ जीना चाहते हैं। अंततः यह यात्रा उस शांत साक्षी की पहचान की ओर ले जाती है जो बदलती भूमिकाओं और विचारों के बीच भी उपस्थित है।